Thursday, September 13, 2018

क्यूँ रोई

वो मुझे मेहन्दी लगे हाथ दिखा कर रोई...

मॅ किसी और की हूँ बस इतना बता कर रोई....

शायद उम्र भर की जुदाई का ख्याल आया था उसे...

वो मुझे पास अपने बिठा कर रोई...
दुख: का एहसास दिला कर रोई...

कभी कहती थी की मैं ना जी पाऊँगी बिन तुम्हारे...
और आज ये बात दोहरा कर रोई....

मुझसे ज़्यादा बिछड़ने का गम था उसे...
वक़्त-ए-ऱुक्सत वो मुझे सीने से लगा कर रोई...

मैं बेकसूर हूँ कुद्रत का फ़ैसला है ये...
लिपट कर मुझसे बस वो इतना बता कर रोई...

मुझ पर दुखों का पहाड़ एक और टूटता...
जब उसने मेरे सामने मेरे खत जला कर रोई...

मेरी नफ़रत और आद्वत पिघल गई एक पल में...
वो बेवफा है तो क्यों मुझे रुला कर रोई...

सब गीले-शिकवाएँ मेरे एक पल में बदल गये...
झील सी आँखों में जब आँसू सज़ा कर रोई...

कैसे उसकी मोहब्बत पर शक़ करें हम...
भरी महफ़िल में वो मुझे गले लगा कर रोई......

                                                       ***

Sunday, September 9, 2018

झलकियाँ - विकास की

मेरे परदादा,
संस्कृत और हिंदी जानते थे।
माथे पे तिलक,
और सर पर पगड़ी बाँधते थे।।

फिर मेरे दादा जी का,
दौर आया।
उन्होंने पगड़ी उतारी,
पर जनेऊ बचाया।।

मेरे दादा जी,
अंग्रेजी बिलकुल नहीं जानते थे।
जानना तो दूर,
अंग्रेजी के नाम से कन्नी काटते थे।।

मेरे पिताजी को अंग्रेजी,
थोड़ी थोड़ी समझ में आई।
कुछ खुद समझे,
कुछ अर्थ चक्र ने समझाई।।

पर वो अंग्रेजी का प्रयोग,
मज़बूरी में करते थे।
यानि सभी सरकारी फार्म,
हिन्दी में ही भरते थे।।

जनेऊ उनका भी,
अक्षुण्य था।
पर संस्कृत का प्रयोग,
नगण्य था।।

वही दौर था, जब संस्कृत के साथ,
संस्कृति खो रही थी।
इसीलिए संस्कृत,
मृत भाषा घोषित हो रही थी।।

धीरे धीरे समय बदला,
और नया दौर आया।
मैंने अंग्रेजी को पढ़ा ही नहीं,
अच्छे से चबाया।।

मैंने खुद को,
हिन्दी से अंग्रेजी में लिफ्ट किया।
साथ ही जनेऊ को,
पूजा घर में सिफ्ट किया।।

मै बेवजह ही दो चार वाक्य,
अंग्रेजी में झाड जाता हूँ।
शायद इसीलिए समाज में,
पढ़ा लिखा कहलाता हूँ।।

और तो और,
मैंने बदल लिए कई रिश्ते नाते हैं।
मामा, चाचा, फूफा,
अब अंकल नाम से जाने जाते हैं।।

मै टोन बदल कर वेद को वेदा,
और राम को रामा कहता हूँ।
और अपनी इस तथा कथित,
सफलता पर गर्वित रहता हूँ।।

मेरे बच्चे,
और भी आगे जा रहे हैं।
मैंने संस्कार चबाया था,
वो अंग्रेजी में पचा रहे हैं।।

यानि उन्हें दादी का मतलब,
ग्रैनी बताया जाता है।
रामा वाज ए हिन्दू गॉड,
गर्व से सिखाया जाता है।।

जब श्रीमती जी उन्हें,
पानी मतलब वाटर बताती हैं।
और अपनी इस प्रगति पर,
मंद मंद मुस्काती हैं।।

जाने क्यों मेरे पूजा घर की,
जीर्ण जनेऊ चिल्लाती है।
और मंद मंद,
कुछ मन्त्र यूँ ही बुदबुदाती है।।

कहती है - ये विकास,
भारत को कहाँ ले जा रहा है।
संस्कार तो गल गए,
अब भाषा को भी पचा रहा है।।

संस्कृत की तरह हिन्दी भी,
एक दिन मृत घोषित हो जाएगी।
शायद उस दिन भारत भूमि,
पूर्ण विकसित हो जाएगी॥

                                      * * *

Friday, September 7, 2018

जिंदगी Vs...

उलझनों और कश्मकश में..
उम्मीद की ढाल लिए बैठा हूँ..
ए जिंदगी! तेरी हर चाल के लिए..
मैं दो चाल लिए बैठा हूँ |

लुत्फ़ उठा रहा हूँ मैं भी आँख - मिचोली का ...
मिलेगी कामयाबी, हौसला कमाल का लिए बैठा हूँ l

चल मान लिया.. दो-चार दिन नहीं मेरे मुताबिक..
गिरेबान में अपने, ये सुनहरा साल लिए बैठा हूँ l

ये गहराइयां, ये लहरें, ये तूफां, तुम्हे मुबारक ...
मुझे क्या फ़िक्र.., मैं कश्तियां और दोस्त...
बेमिसाल लिए बैठा हूँ..

Wednesday, August 22, 2018

वक़्त

वो भूले बिसरे लम्हें याद आएंगे
धुँधला ही मगर मेरा चेहरा नज़र आएगा ll

हम अश्क नहीं जो पलकों से गिर जाएं
हवा के झोंके की तरह फिर पलट आएँगे ll

अश्क आँखों में लेकर बैठोगे कहीं
चेहरे पर वहीं मुस्कान बनकर बिखर जाएंगे ll

वक़्त बे वक़्त तन्हा होकर जाओगे कभी
तब भी तेरी परछइयों में नज़र आएँगे ll

अश्क मत बहाना ये अनमोल होते हैं
मोती हैं टूट कर बिखर जाएंगे ll

                               - डॉ. पंकज मिश्रा

Thursday, July 19, 2018

अंतरमन सच बोलेगा.......

घनघोर अंधेरा छाये जब
कोई राह नज़र ना आये जब
कोई तुमको फिर बहकाये जब
इस बात पे थोड़ी देर तलक
तुम आँखें अपनी बंद करना
और अंतरमन की सुन लेना
मुमकिन है हम-तुम झूठ कहें
पर अंतरमन सच बोलेगा..........

जब लम्हा-लम्हा 'आरी' हो
और ग़म खुशियों पे भारी हो
दिल मुश्किल में जब पड़ जाये
कोई तीर सोच की 'अड़' जाये
तुम आँखें अपनी बंद करना
और अंतरमन की सुन लेना
मुमकिन है हम-तुम झूठ कहें
पर अंतरमन सच बोलेगा........

जब सच-झूठ में फर्क ना हो
जब गलत-सही में घिर जाओ
तुम नज़र में अपनी गिर जाओ
इस बात पे थोड़ी देर तलक
तुम आँखें अपनी बंद करना
और अंतरमन की सुन लेना
मुमकिन है हम-तुम झूठ कहें
पर अंतरमन सच बोलेगा........

ये जीवन एक छाया है
दुख, दर्द, मुसीबत माया है
दुनिया की भीड़ में खोने लगो
तुम खुद से दूर होने लगो
तुम आँखें अपनी बंद करना
और अंतरमन की सुन लेना
मुमकिन है हम तुम झूठ कहें
पर अंतरमन सच बोलेगा ......।

Wednesday, July 11, 2018

ll नई ग़ज़ल ll

ये और बात, दूर रहे मंज़िलों से हम,
बच कर चले हमेशा मगर रहबरों से हम.

मंज़िल की है तलब तो हमें साथ ले चलो,
वाकिफ़ हैं ख़ूब राह की बारीकियों से हम.

कुछ तो हमारे बीच कभी दूरियाँ भी हों,
तंग आ गए हैं रोज़ की, नज़दीकियों से हम.

गुज़रें हमारे घर की किसी रहगुज़र से वो,
परदें हटाएँ, देखें उन्हें खिड़कियों से हम.

जब भी कहा के- 'याद हमारी कहाँ उन्हें ?'
पकड़े गए हैं ठीक तभी, हिचकियों से हम.

जिनके परों पे सुबह की ख़ुशबू के रंग हैं,
बचपन उधार लाए हैं उन तितलियों से हम.

Aalok Shrivastav

चाय

एक तेरा ख़्याल ही तो है मेरे पास...

वरना कौन अकेले में बैठे कर चाय पीता है...!!!

आज लफ्जों को मैने शाम की चाय पे बुलाया है...

बन गयी बात तो ग़ज़ल भी हो सकती है...!!!

ठान लिया था कि अब और नहीं पियेगें चाय उनके हाथ की...

पर उन्हें देखा और लब बग़ावत कर बैठे...!!!

मिलो कभी चाय पर फिर क़िस्से बुनेंगे...

तुम ख़ामोशी से कहना हम चुपके से सुनेंगे...!!!

चाय के कप से उड़ते धुंए में मुझे तेरी शक़्ल नज़र आती है...

तेरे इन्ही ख़यालों में खोकर, मेरी चाय अक्सर ठंडी हो जाती है...!!!

हलके में मत लेना तुम सावले रंग को...

दूध से कहीं ज्यादा देखे है मैंने शौक़ीन चाय के...!!!

~ Unknown