इलाइची की महक ओढ़े,
अदरक का श्रृंगार कर सजी थी..
केतली की दहलीज से निकल कर,
ग्लास की डोली में बैठी थी..
इस भागते हुए वक़्त पर,
कैसे लगाम लगाई जाए..
ऐ वक़्त आ बैठ,
तुझे एक कप चाय पिलायी जाए..!!
Thursday, August 22, 2019
चाय
Saturday, June 15, 2019
वही आँगन वही खिड़की वही दर याद आता है
वही आँगन वही खिड़की वही दर याद आता है
अकेला जब भी होता हूँ मुझे घर याद आता है
मेरी बे-साख़्ता हिचकी मुझे खुल कर बताती है
तेरे अपनों को गाँव में तू अक्सर याद आता है
जो अपने पास हों उन की कोई क़ीमत नहीं होती
हमारे भाई को ही लो बिछड़ कर याद आता है
सफलता के सफ़र में तो कहाँ फ़ुर्सत कि कुछ सोचें
मगर जब चोट लगती है मुक़द्दर याद आता है
मई और जून की गर्मी बदन से जब टपकती है
नवम्बर याद आता है दिसम्बर याद आता है
*आलोक श्रीवास्तव जी
Thursday, September 13, 2018
क्यूँ रोई
वो मुझे मेहन्दी लगे हाथ दिखा कर रोई...
मॅ किसी और की हूँ बस इतना बता कर रोई....
शायद उम्र भर की जुदाई का ख्याल आया था उसे...
वो मुझे पास अपने बिठा कर रोई...
दुख: का एहसास दिला कर रोई...
कभी कहती थी की मैं ना जी पाऊँगी बिन तुम्हारे...
और आज ये बात दोहरा कर रोई....
मुझसे ज़्यादा बिछड़ने का गम था उसे...
वक़्त-ए-ऱुक्सत वो मुझे सीने से लगा कर रोई...
मैं बेकसूर हूँ कुद्रत का फ़ैसला है ये...
लिपट कर मुझसे बस वो इतना बता कर रोई...
मुझ पर दुखों का पहाड़ एक और टूटता...
जब उसने मेरे सामने मेरे खत जला कर रोई...
मेरी नफ़रत और आद्वत पिघल गई एक पल में...
वो बेवफा है तो क्यों मुझे रुला कर रोई...
सब गीले-शिकवाएँ मेरे एक पल में बदल गये...
झील सी आँखों में जब आँसू सज़ा कर रोई...
कैसे उसकी मोहब्बत पर शक़ करें हम...
भरी महफ़िल में वो मुझे गले लगा कर रोई......
***
Sunday, September 9, 2018
झलकियाँ - विकास की
मेरे परदादा,
संस्कृत और हिंदी जानते थे।
माथे पे तिलक,
और सर पर पगड़ी बाँधते थे।।
फिर मेरे दादा जी का,
दौर आया।
उन्होंने पगड़ी उतारी,
पर जनेऊ बचाया।।
मेरे दादा जी,
अंग्रेजी बिलकुल नहीं जानते थे।
जानना तो दूर,
अंग्रेजी के नाम से कन्नी काटते थे।।
मेरे पिताजी को अंग्रेजी,
थोड़ी थोड़ी समझ में आई।
कुछ खुद समझे,
कुछ अर्थ चक्र ने समझाई।।
पर वो अंग्रेजी का प्रयोग,
मज़बूरी में करते थे।
यानि सभी सरकारी फार्म,
हिन्दी में ही भरते थे।।
जनेऊ उनका भी,
अक्षुण्य था।
पर संस्कृत का प्रयोग,
नगण्य था।।
वही दौर था, जब संस्कृत के साथ,
संस्कृति खो रही थी।
इसीलिए संस्कृत,
मृत भाषा घोषित हो रही थी।।
धीरे धीरे समय बदला,
और नया दौर आया।
मैंने अंग्रेजी को पढ़ा ही नहीं,
अच्छे से चबाया।।
मैंने खुद को,
हिन्दी से अंग्रेजी में लिफ्ट किया।
साथ ही जनेऊ को,
पूजा घर में सिफ्ट किया।।
मै बेवजह ही दो चार वाक्य,
अंग्रेजी में झाड जाता हूँ।
शायद इसीलिए समाज में,
पढ़ा लिखा कहलाता हूँ।।
और तो और,
मैंने बदल लिए कई रिश्ते नाते हैं।
मामा, चाचा, फूफा,
अब अंकल नाम से जाने जाते हैं।।
मै टोन बदल कर वेद को वेदा,
और राम को रामा कहता हूँ।
और अपनी इस तथा कथित,
सफलता पर गर्वित रहता हूँ।।
मेरे बच्चे,
और भी आगे जा रहे हैं।
मैंने संस्कार चबाया था,
वो अंग्रेजी में पचा रहे हैं।।
यानि उन्हें दादी का मतलब,
ग्रैनी बताया जाता है।
रामा वाज ए हिन्दू गॉड,
गर्व से सिखाया जाता है।।
जब श्रीमती जी उन्हें,
पानी मतलब वाटर बताती हैं।
और अपनी इस प्रगति पर,
मंद मंद मुस्काती हैं।।
जाने क्यों मेरे पूजा घर की,
जीर्ण जनेऊ चिल्लाती है।
और मंद मंद,
कुछ मन्त्र यूँ ही बुदबुदाती है।।
कहती है - ये विकास,
भारत को कहाँ ले जा रहा है।
संस्कार तो गल गए,
अब भाषा को भी पचा रहा है।।
संस्कृत की तरह हिन्दी भी,
एक दिन मृत घोषित हो जाएगी।
शायद उस दिन भारत भूमि,
पूर्ण विकसित हो जाएगी॥
* * *
Friday, September 7, 2018
जिंदगी Vs...
उलझनों और कश्मकश में..
उम्मीद की ढाल लिए बैठा हूँ..
ए जिंदगी! तेरी हर चाल के लिए..
मैं दो चाल लिए बैठा हूँ |
लुत्फ़ उठा रहा हूँ मैं भी आँख - मिचोली का ...
मिलेगी कामयाबी, हौसला कमाल का लिए बैठा हूँ l
चल मान लिया.. दो-चार दिन नहीं मेरे मुताबिक..
गिरेबान में अपने, ये सुनहरा साल लिए बैठा हूँ l
ये गहराइयां, ये लहरें, ये तूफां, तुम्हे मुबारक ...
मुझे क्या फ़िक्र.., मैं कश्तियां और दोस्त...
बेमिसाल लिए बैठा हूँ..
Wednesday, August 22, 2018
वक़्त
वो भूले बिसरे लम्हें याद आएंगे
धुँधला ही मगर मेरा चेहरा नज़र आएगा ll
हम अश्क नहीं जो पलकों से गिर जाएं
हवा के झोंके की तरह फिर पलट आएँगे ll
अश्क आँखों में लेकर बैठोगे कहीं
चेहरे पर वहीं मुस्कान बनकर बिखर जाएंगे ll
वक़्त बे वक़्त तन्हा होकर जाओगे कभी
तब भी तेरी परछइयों में नज़र आएँगे ll
अश्क मत बहाना ये अनमोल होते हैं
मोती हैं टूट कर बिखर जाएंगे ll
- डॉ. पंकज मिश्रा
Thursday, July 19, 2018
अंतरमन सच बोलेगा.......
घनघोर अंधेरा छाये जब
कोई राह नज़र ना आये जब
कोई तुमको फिर बहकाये जब
इस बात पे थोड़ी देर तलक
तुम आँखें अपनी बंद करना
और अंतरमन की सुन लेना
मुमकिन है हम-तुम झूठ कहें
पर अंतरमन सच बोलेगा..........
जब लम्हा-लम्हा 'आरी' हो
और ग़म खुशियों पे भारी हो
दिल मुश्किल में जब पड़ जाये
कोई तीर सोच की 'अड़' जाये
तुम आँखें अपनी बंद करना
और अंतरमन की सुन लेना
मुमकिन है हम-तुम झूठ कहें
पर अंतरमन सच बोलेगा........
जब सच-झूठ में फर्क ना हो
जब गलत-सही में घिर जाओ
तुम नज़र में अपनी गिर जाओ
इस बात पे थोड़ी देर तलक
तुम आँखें अपनी बंद करना
और अंतरमन की सुन लेना
मुमकिन है हम-तुम झूठ कहें
पर अंतरमन सच बोलेगा........
ये जीवन एक छाया है
दुख, दर्द, मुसीबत माया है
दुनिया की भीड़ में खोने लगो
तुम खुद से दूर होने लगो
तुम आँखें अपनी बंद करना
और अंतरमन की सुन लेना
मुमकिन है हम तुम झूठ कहें
पर अंतरमन सच बोलेगा ......।