Wednesday, July 11, 2018

इंसान जाने कहां खो गये हैं !

जाने क्यूं अब शर्म से,
चेहरे गुलाब नही होते।
जाने क्यूं अब मस्त मौला
मिजाज नही होते।

पहले बता दिया करते थे,
दिल की बातें।
जाने क्यूं अब चेहरे
खुली किताब नही होते।

सुना है बिन कहे
दिल की बात समझ लेते थे।
गले लगते ही
दोस्त हालात समझ लेते थे।

तब ना व्हाटसप
ना स्मार्ट मोबाइल था l
ना फेसबुक
ना ट्विटर अकाउंट था l

एक शब्द से ही
वक़्त का मिज़ाज़ समझ लेते थे l
एक चिट्टी से ही
दिलों के जज्बात समझ लेते थे।

सोचता हूं
हम कहां से कहां आ गये l
प्रेक्टीकली सोचते सोचते
भावनाओं को खा गये।

अब भाई भाई से
समस्या का समाधान कहां पूछता है l
अब बेटा बाप से
उलझनों का निदान कहां पूछता है l
बेटी नही पूछती
मां से गृहस्थी के सलीके l
अब कौन गुरु के
चरणों में बैठकर ज्ञान की परिभाषा सीखे।

परियों की बातें
अब किसे भाती है l
अपनो की याद
अब किसे रुलाती है l

अब कौन
गरीब को सखा बताता है l
अब कहां
कृष्ण सुदामा को गले लगाता है l

जिन्दगी मे
हम प्रेक्टिकल हो गये हैं
मशीन बन गये है सब
इंसान जाने कहां खो गये हैं !

Unknown

Saturday, November 15, 2014

जब हमें ही रिश्ते निभाने हैं..


जब हमें ही रिश्ते निभाने हैं..


जब हमें ही रिश्ते निभाने हैं
रिश्तों को बिखरने से बचाने हैं !!

तो फिर जाने दो -२
नये लोगों को आने दो!!

अब तक वक़्त के साथ चलता रहा हूँ 
अब वक़्त से भी आगे निकल जाने दो!!

ठहरा रहा हूँ सदैव बंदिसों के साथ
अब बंदिसें तोड़ के बह जाने दो!!

अभी तक सुनता रहा हूँ दुनिया की
अब मेरे दिल की भी कुछ सुनाने दो!!

अभी तक परखा गया हूँ रिश्तों में 
अब मुझे भी रिश्तों को आज़माने दो !!

महसूस की है रिश्तों की ज़रूरत को सदैव 
वज़ूद मेरा भी है अपना, ये रिश्तों को बतलाने दो !!

कब कहा की मनाने से मानता नही कोई
पर थोड़ी देर के लिए ही रूठ  जाने दो !!


                                डा. पंकज

Sunday, February 16, 2014

हो सकता है कि.....

हो सकता है कि इस दुनिया कि भीड़ में,
हम भी खो जाएँ कहीं||

न रहे अगर इस जहाँ में तो,
सितारें बनकर झिलमिलाएंगे कहीं ||

चांदनी रात में हम भी देखेंगे तुम्हे,
जब बेचैन होकर तन्हा जाओगे कहीं ||

तेरी पलकें जब भी भीगेंगी कभी,
मेरी भी आँखों से बरसात होगी कहीं ||

उन रास्तों से हवा बनकर गुजर जाउंगा,
जिन रास्तों से तू निकलेगी कभी ||

क्योंकि मुझे भी डर है कि कोई काँटा,
इन पैरों में चुभ न जाएँ कहीं ||


डॉ. पंकज मिश्रा

Saturday, February 15, 2014

एक अनोखा सपना देखा

एक अनोखा सपना देखा
सपनो में तुम आये थे ||

बारिश , तितली और पतंगे
साथ में तुम ले आये थे ||

होली के रंगों में रंगकर
दूर से तुम मुस्काये थे ||

दीवाली का दिया जलाकर
खुशियों को फैलाये थे ||

नींद खुली तो तन्हाई थी
दूर तलक एक परछायी थी ||

आँख में बस वो सपना था
जिस सपने में तुम आये थे ||

एक अनोखा सपना देखा
सपने में तुम आये थे................

 * डॉ. पंकज मिश्रा  

Sunday, December 8, 2013

कितनी ख़ामोशियाँ सुनाते हैं

कितनी ख़ामोशियाँ सुनाते हैं
लोग जब बोलने पर आते हैं||

वो हमें रास्ता दिखाते हैं 

जिन्हे हम रास्ते पर लाते हैं||

ना घर छूटा, ना राम कहलाए

फिर भी हम रोज़ वनवास पाते हैं||

अपने अंदर भी एक रावण है

क्या उसे भी कभी जलाते हैं||

बूँद हूँ मॅ वज़ूद मेरा क्या

पर समंदर भी हममें डूब जाते हैं||

क्या है उस पार खुद ही देखेंगे

लोग कुछ का कुछ बताते हैं||


ड़ा. पंकज मिश्रा 

बहुत लोगों से हम अच्छे रहे

जिसमें पानी था वो बादल आग बरसाते रहे,
लोग नावाकिफ़ हवाओं की सियासत से रहे||

कैसा मेला था कि सारा शहर जिसमें खो गया,

घर,गली और मुहल्ले आज तक सुने रहे||

उस पराए शक्स से कैसा अजब रिस्ता रहा,

आँख नम उसकी हुई हम आज तक भीगे रहे||

तेज़ आँधियों के खिलाफ अपनी जगह कायम रहे,

या ये कहो की हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे||

एक सपना टूटने का दुख:रहा सदियों तलक,

अब ये लगता है बहुत लोगों से हम अच्छे रहे||



ड़ा. पंकज मिश्रा


Sunday, September 29, 2013

माँ !

                                                      माँ !
जब भी कभी मै सोचने बैठता हूँ तो ...........
बचपन के गलियारे से लेकर जवानी की इस भागती सड़को पर हमेशा तुझे साथ पाता हूँ .

सोचता हूँ की तू न होती तो क्या अपने पैरों पर चलना संभव था ???
सोचता हूँ की तुने हर मुश्किल पल को कितना आसन बनाया .

सोचता हूँ की तू न होती तो क्या ज़िन्दगी के सही मायनो को समझ पाता ???
ये भी नही भूला  हूँ जब छोटी - छोटी गलतियों पर बेलन और डंडे से पिटाई की थी .

सोंचता हूँ की तू न होती तो क्या धूप बरसात और आंधियों के साथ आज भी मै खड़ा होता ???
नही भूला  ओ रातें जब रात- रात भर जग कर मुझे सुलाया था .

सोंचता हूँ की आज भी तेरे पास आकर सारी परेशानियाँ ,तनाव और डर क्यों गायब हो जाता हैं ???
सोंच कर घबरा जाता हूँ कभी कभी की तुम बिन कभी जीना पड़ा तो क्या जी सकूँगा  ???

इस उत्तर की तलाश में भटक रहा हूँ 
और शायद अनंत काल तक भटकता रहूँ गा .

- पंकज मिश्र